फिल्म समीक्षा: ‘दिल्ली 47 किमी’

'दिल्ली 47 किमी'

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#ReviewRating: 4 star / 5 star

फिल्मो को समाज का आइना कहा जाता है. फिल्मकार अपने अपने ढंग से देश और समाज में व्याप्त समस्याओं को दिखाते रहते हैं. इस हफ़्ते रिलीज़ हुई युवा निर्देशक शादाब खान की फिल्म ‘दिल्ली 47 किमी’ समाज की कुछ कडवी सच्चाइयों को बड़ी बेबाकी से दिखाती है.
“बीए पास 2′ के फिल्मकार शादाब खान ने अपनी फिल्म ‘दिल्ली 47 किमी’ में समाज के कुछ मुद्दों को बड़ी बेबाकी से दिखाया है. इस फ़िल्म के माध्यम से डायरेक्टर ने तालीम की अहमियत पर ध्यान दिलाने का प्रयास भी किया है. फ़िल्म दिल्ली 47 किमी में कई लेयर्स हैं और उनमें से एक शिक्षा का अधिकार भी है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मिंटू नाम का बच्चा तालीम से वंचित रह जाता है और उसका बाप हथियारों के व्यापार में उलझा हुआ है. ‘दिल्ली 47 किमी’ एक ऐसे क्षेत्र की कहानी है जो भारतीय राजधानी दिल्ली से केवल 47 किलोमीटर दूर है और इस क्षेत्र में मादक पदार्थो व अवैध हथियारों का कारोबार होता है और वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाएं शोषण की शिकार हैं. फिल्म में रजनीश दुबे, डॉली तोमर और मुस्तकीम खान ने अदाकारी की है. फ़िल्म के लेखक निर्देशक शादाब खान की यह अच्छी कोशिश है. फ़िल्म क्राइम सटायर है और देश मे लॉ एंड ऑर्डर के उपर सवाल उठाती है. फ़िल्म के कुछ दृश्य दर्शको को चौंका देते हैं. इस फ़िल्म में जिस इलाके को बताया गया है वह भारत की राजधानी दिल्ली से महज 47 किलोमीटर दूर है. फिल्म देख कर एहसास होता है कि अगर ऐसी जगह पर इतने भयानक क्राइम होते है, तो फिर देश के गाँवो या छोटे शहरों में कानून व्यवस्था की हालत क्या होगी? फिल्म यह अहम् सवाल उठाती है. फ़िल्म में सभी एक्टर्स ने उम्दा प्रदर्शन किया है. स्क्रीनप्ले अच्छा लिखा हुआ है साथ ही सिनेमेटोग्राफी नेचुरल सीन पेश करती है. फ़िल्म का म्यूजिक अच्छा है. रियलिस्टिक सिनेमा पसन्द करने वालों को यह फ़िल्म अवश्य पसंद आएगी. छोटे शहरों की ऑडियंस भी इस मूवी से कनेक्ट कर सकेगी. फिल्म की स्टोरी, स्क्रीनप्ले और संवाद शादाब खान ने लिखे हैं जबकि डीओपी ओवेस खान, संगीतकार दीपक कुमार और वारसी ब्रदर्स, गीतकार शादाब खान, एडिटर योगेश पाण्डेय, विनय पटेल, आर्ट डायरेक्टर सादिया खान हैं. फिल्म में रजनीश दुबे, शादाब खान, डॉली तोमर, निति यादव, उत्कर्ष दुबे, बहादुर सिंह, बॉबी वत्स, शर्जिल काजी और केवल विश्वकर्मा ने अहम भूमिकाएँ निभाई हैं. फिल्म को बेहद नेचुरल ढंग से शूट किया गया है. ना तो अधिक मेकअप और ना अधिक बनावटीपन. इसलिए फिल्म देखते समय ऐसा लगता है कि जैसे आप कोई रियल घटना देख रहे हैं और यही सिनेमा का जादू है जो आपको एक अलग ही दुनिया में लेकर चला जाता है. शादाब खान की कोशिश को सराहा जाना चाहिए. (गाजी अंसारी)
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