पुरानी डायरी “हिना”

पुरानी डायरी “हिना”

दिव्य सिंह राजपूत (सम्पादकीय) : प्यार की कोई उम्र नहीं होती और ना ही कोई सीमा| कहते हैं, कि प्यार वह सुहावना भावना है, जो इंसान के सोचने का नजरिया बदल देता है| इंसान के लिये उसकी भावनायें बहुत मायने रखती है| भावनावों के आवेग में बहते हुए ही, इंसान अपने आने वाले कल की सुनहरी सेज सजाता है| और वह सेज ही उसके अस्तित्व को एक चेहरा प्रदान करती है| प्यार कब, कैसे, किससे और कहाँ हो जाये, इसकी भनक तक हमें नहीं लग पाती| जब किसी को प्यार होता है तो उसे साड़ी दुनिया जाने-अनजाने हसीन लगने लगती है, ऐसा लगता है जैसे की वो किसी और दुनिया में विचरण कर रहा है| प्यार के उस दौर में आप अपने आप को नदी के लहरों में तैरते हुए एक तैराक की तरह होते है, जहाँ आपको बस नदी के लहरों के साथ अठखेलियाँ करने में मजा आता है और एक नया रोमांच आपके अन्दर पनपने लगता है| इस दौर की सबसे बड़ी खूबी यह होती है की आपको शुरुवात में कोई फर्क नहीं पड़ता की सामने वाला आपसे प्यार करता है या नहीं| गान, यह ज़रूर है कि आपको इस बात की चिंता हमेशा सताती है की उसे कोई तकलीफ ना हो| क्यूंकि एक छोटी सी चुभन उसके पैर में भी हो तो उस चुभन का दर्द हमारे पूरे शरीर में होता है| हम अपनी हर खुशियाँ उसके लिये नज़रंदाज़ करते चले जाते है, ताकि उसको खुश रख सके| प्यार के किस्से और कहानियाँ बहुत है और बहुत सारी कहानियों को अपने आँखों के सामने से गुजरता हुआ देखा है| कभी प्यार में कोई सफल होता है तो कभी कोई असफल| इनके सफल होने और असफल होने का फर्क यह पड़ता है की सफल कहानियाँ हमारे चेहरे पर मुस्कान बिखेर जाती है और असफल कहानियाँ हमारी खुशियों को कारे बादल के घटा जैसे घेर लेते है, जहाँ एक ऐसी बरसात की शुरुवात होने वाली होती है जिसकी टीस ताउम्र हमारे साथ चलने वाली होती है| खैर, डी.डी.१ से हमारा नाता खासा गहरा हो गया था| हमें डी.डी.१ पर प्रसारित होने वाला हर कार्यक्रम लुभावना लगता था| यह भी एक किस्म का प्यार है, जिसे हम आज भी यादों के सिरहाने तले संजोये हुए है| आज जिस फिल्म “हिना” की बात कर रहे है, इसकी कहानी भी प्यार के इर्द-गिर्द घूमती है| जैसा की सभी जानते है की प्यार देश की सीमाओं से परे अपनी एक खुद की दुनिया बनाता है; जहाँ हमें कोई रुकावट महसूस नहीं होती| लेकिन कभी-कभी यह सीमाए भी हमें जीवन रुपी पिंजरे से आज़ाद कराने के लिये काफी होती है| घर की चारदिवारी तो हम फंड जाते है मगर उसके बाद अपने आप को उस परिवेस में कैसे ढाले इसकी जद्दोजहद चलती रहती है| प्यार का भी कुछ हाल ऐसा ही है| फिल्म में एक लड़की अपने दुश्मन देश के लड़के के प्यार में ऐसा गिरफ्त होती है कि उसे उसके देश सकुशल पहुचाना ही उसकी मंजिल बन जाती है और इस मंजिल की तलाश में उसे अपने जीवन का परित्याग करना पड़ जाता है| ठीक दूसरी तरफ एक प्रेमिका जो की अपने प्रेमी से ब्याह रचाने वाली थी, उसके खो जाने के बाद भी उसके इंतज़ार में घड़ियों की सुईओं की तरफ एकटक निहारते रहती है कि वह समय आएगा जब उसका प्यार उसके सामने होगा| रविवार की एक सुबह रंगोली कार्यक्रम के बीच में इस फिल्म का जिक्र हुआ और उसी दिन शाम ४ बजे इसका प्रसारण भी होना था| हमें बखूबी याद है की उस रोज हमारा क्रिकेट का मैच था और दाँव पर लगा हुआ था ३ रूपये वाली ब्रिटानिया की टाइगर बिस्कुट| उस वक़्त यह बिस्कुट का मैच भी हमारे लिये खासा मायने रखता था| उस ३ रुपये वाले बिस्कुट के पैकेट में १२ पिस बिस्कुट होते थे और खिलाड़ी कुल मिलाकर ११ | वह अतिरिक्त बिस्कुट कप्तान के झोले में जाकर गिरता था, क्यूंकि मैच के दौरान पैसा भी उसी का लगता था| हिना देखने के चक्कर में, मैंने उस मैच को दरकिनार कर दिया| जिसकी सजा बाद में यह तय की गयी कि आगे होने वाले दो मैच में हम ना खेलेंगे| सीधे-सीधे शब्दों में हमें टीम से निष्काषित कर दिया गया| मगर उसका कुछ खासा प्रभाव हमारे ऊपर ना पड़ा, क्यूंकि हिना फिल्म वाला पलड़ा ज्यादा वजनी हो गया था, मैच वाले पलड़े की तुलना में| फिल्म की शुरुवात देर ना हो जाए गाने से होती है, जिसके तुरंत बाद चंद्रप्रकाश की जीप का एक्सीडेंट हो जाता है और चंद्रप्रकाश उसके बाद अपने आप को दुसरे देश की सीमा के अन्दर पाता है| उसके बाद जिस तरह की परिस्थितियाँ चंद्रप्रकाश के सामने आती है, उनको देखकर आप सम्मोहन के उस जाल में फँस जाते है, जहाँ से निकलने का दिल नहीं करता| यही कारन था की बीच-बीच में आने वाले प्रचार भी हमको हिना के सम्मोहन से आज़ाद ना करा पाए और हम टी.वी. पर एकटक नज़रें गड़ाये, मिट्टी वाली सतह पर चिपके रहे| हिना के किरदार को इतने बखूबी से संजोया गया था कि हम भगवान् से प्रार्थना करने लग गये थे कि चन्द्रप्रकाश जो की अब चाँद बन चूका था, वहीँ पकिस्तान में बस जाये या तो फिर हिन्दुस्तान आये भी तो हिना के साथ| फिल्म के अंत में जब हिना मरती है उस वक़्त आँखों में आंसू आ गये थे और ह्रदय दर्द की अन्नत गहराइयों में समाहित हो गया था, जिसकी वेदना झेलने की उम्र उस वक़्त हमारी ना थी| समझ नहीं आ रहा था की ऐसा क्यों हो गया, ऐसी क्या गलती थी कि हिना ने या फिर उसके चाँद ने, जो थोड़ी देर बाद चाँद से फिर चन्द्रप्रकाश बन जायेगा| दिमाग के अन्दर उहापोह मची हुई थी की बस थोड़ी दूर और जाना था, फिर सब ठीक हो जाता और हिना अपने चाँद के साथ होती| मगर होनी को यह नसीब नहीं था, या फिर शायद लेखक को इससे बेहतरीन अंत नहीं सूझा होगा| चाँद अब चन्द्रप्रकाश बन कर चांदनी के सामने था, जिसने पूरी फिल्म में बस विश्वास की एक डोर को पकडे रखा था कि उसका प्यार वापिस ज़रूर आयेगा| फिल्म का अंत चाहे जैसा भी रहा हो, हम सबका दिल हिना का  कैदी बन चूका था| जिसकी पकड़ आम बेड़ियों से कहीं ज्यादा मजबूत थी|
राज कपूर साहब की यह आखिरी फिल्म मानी जाती है| हिना फिल्म के सारे गाने कर्णप्रिय है| हिना के किरदार के ऊपर फिल्माया गया यह गाना “ मैं हूँ खुशरंग हिना” वाकई लाजवाब है|

पुरानी डायरी “हिना”
पुरानी डायरी “हिना”

निर्माता :- रणधीर कपूर, राजीव कपूर
निर्देशक :- रणधीर कपूर
लेखक :- ख्वाजा अहमद अब्बास, जैनेन्द्र जैन, वी.पी. साठे, हसीना मोईन
संगीतकार :- रविन्द्र जैन
कलाकार :-
ऋषि कपूर
ज़ेबा बख्तियार
अश्विनी भावे
सईद जाफरी
फरीदा जलाल
कुलभूषण खरबंदा
किरण कुमार
रीमा लागू
रज़ा मुराद
मोहनीश बहल

गाने :-
बेदर्दी तेरे प्यार ने
गायिका :- लता मंगेश्कर
वश मल्ले
गायक :- मो. अज़ीज़
अनार दाना
गायिका :- लता मंगेश्कर
मरहब्बा सय्यदी
गायक :- मो. अज़ीज़
मैं हूँ खुशरंग हिना
गायिका :- लता मंगेश्कर
मैं देर करता नहीं
गायक :- सुरेश वाडेकर , लता मंगेश्कर
चिठिये
गायिका :- लता मंगेश्कर
देर ना हो जाए कहीं
गायक:- सुरेश वाडेकर, लता मंगेश्कर, मो. सईद, फरीद साबरी, सतीश
जानेवाले ओ जानेवाले
गायक:- सुरेश वाडेकर, लता मंगेश्कर

Related posts

Leave a Comment