धड़क – प्यार भरी धड़कन

निर्देशक :- शशांक खैतान संगीत :- अतुल-अजय कास्ट:- इशांत खट्टर, जहान्वी कपूर, आशुतोष राणा, खरज मुखर्जी, विश्वनाथ चटर्जी अवधि :- 137 मिनट मूल परिकल्पना मराठी फिल्म सैराट का रीमेक है फ़िल्म सैराट मराठी सिनेमा की केवल एक फ़िल्म नही वृतांत थी जिसकी लागत महज 4 करोड़ थी और आमदनी 120 करोड़ ₹ फ़िल्म सैराट का यह पहला रीमेक नही हैं धड़क के पहले भी पंजाबी, कन्नड़, उड़िया भाषा मे रीमेक बन चुके है पंजाबी में पंकज बत्रा चन्ना मोरिया नाम से, कन्नड़ में मानसु मल्लिगे, उड़िया भाषा मे लैला ओ…

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पेंटर मोहम्मद सुलेमान की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी मुंबई की जहाँगीर आर्ट गैलरी में

पेंटर मोहम्मद सुलेमान

मोहम्मद सुलेमान देश के एक ऐसे पेंटर हैं जिनकी प्रदर्शनी विभिन्न शहरों में लगती रहती है और कला प्रेमी उनकी पेंटिंग्स को हाथो हाथ लेते भी हैं. बिहार के जिला समस्तीपुर में जन्मे मोहम्मद सुलेमान की पेंटिंग्स के प्रशंसको के लिए एक खुशखबरी यह है कि अब उनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी मुंबई के प्रसिद्ध जहाँगीर आर्ट गैलरी में 31जुलाई से होने जा रही है. “आस्था उल्लास” के नाम से मोहम्मद सुलेमान की एकल चित्रकला प्रदर्शनी जहाँगीर आर्ट गैलरी में 6 अगस्त 2018 तक रहेगी. बेहद कष्ट भरा जीवन जीने वाले…

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फिल्म समीक्षा: ‘दिल्ली 47 किमी’

'दिल्ली 47 किमी'

www.filmykhabarmantra.com #ReviewRating: 4 star / 5 star फिल्मो को समाज का आइना कहा जाता है. फिल्मकार अपने अपने ढंग से देश और समाज में व्याप्त समस्याओं को दिखाते रहते हैं. इस हफ़्ते रिलीज़ हुई युवा निर्देशक शादाब खान की फिल्म ‘दिल्ली 47 किमी’ समाज की कुछ कडवी सच्चाइयों को बड़ी बेबाकी से दिखाती है. “बीए पास 2′ के फिल्मकार शादाब खान ने अपनी फिल्म ‘दिल्ली 47 किमी’ में समाज के कुछ मुद्दों को बड़ी बेबाकी से दिखाया है. इस फ़िल्म के माध्यम से डायरेक्टर ने तालीम की अहमियत पर ध्यान…

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बिहारी स्‍वैग स्‍वाति शर्मा ने ‘तेरा घाटा’ गाने में बिखेरा अपनी आवाज का जादू  

‘तेरा घाटा’

गजेंद्र वर्मा के लिरिक्‍स ‘तेरा घाटा’ के फीमेल वाइस में बिहारी स्‍वैग यानी स्‍वाति शर्मा ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा है, जिसे लोग खूब पसंद भी कर रहे हैं। इस गाने को स्‍वाति ने अपने ही यू-ट्यूब चैनल से रिलीज किया है। इसका मेल वर्जन यू-ट्यूब पर बेहद पॉपुलर हुआ था, जिसके बाद अब इसके फीमेल वर्जन में स्‍वाति शर्मा ने अपनी आवाज से इसे और भी खूबसूरत बना दिया है। इस बारे में स्‍वाति की मानें तो ‘तेरा घाटा’ सौंग यूथ के बीच काफी फेमस है और मुझे…

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यूट्यूब पर ट्रेंड कर रहे प्रियेश सिन्हा

प्रियेश सिन्हा

लगभग 4000 एपिसोड से अधिक टीवी सिरियल , 25 से अधिक रियलिटी शो और फिल्मो में अभिनय कर चुके मोस्ट पापुलर फेस आफ पूर्वांचल एक्टर प्रियेश सिन्हा इन दिनों यूट्यूब पर ट्रेंड कर रहे  हैं। हर बार कुछ नया लेकर दर्शकों को रिझाने वाले प्रियेश इन दिनों यूट्यूब पर स्टैंड अप कॉमेडी कर रहे हैं और इनके द्वारा डाले गए कॉमेडी वीडियोज यूट्यूब पर ट्रेंड कर रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई स्टैंड अप कॉमेडियन यूट्यूब ट्रेंडिंग में शामिल हुआ है। प्रियेश के हर वीडिओज़ को लाखो व्यूज मिल रहे हैं। रियल लाइफ…

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अब पत्रकारिता करेगी अभिनेत्री अर्चना प्रजापति।

अर्चना प्रजापति

फ़िल्म जगत और टीवी रिपोर्टर में एक समानता यह है कि आज के दौर में दोनों ही फील्ड ग्लेमर वर्ल्ड में आते हैं । कलाकारों के साथ साथ टी वी एंकर और रिपोर्टर को भी दुनिया भली भांति पहचानती है । ऐसे में नाम और शोहरत के शौकीन लोगो को यह फील्ड हमेशा से आकर्षित करता है । अब खबर यह है कि कई भोजपुरी फिल्मो और धारावाहिको में काम कर चुकी अभिनेत्री अर्चना प्रजापति ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रख दिया है और अपने अचूक सवाल सेलिब्रेटियों और…

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रिव्यू-‘धड़क’ न तो ‘सैराट’ है न ‘झिंगाट’

ऊंची जात की अमीर लड़की।नीची जात का गरीब लड़का।आकर्षित हुए, पहले दोस्ती,फिर प्यार कर बैठे। घर वालेआड़े आए तो दोनों भाग गए।जिंदगी की कड़वाहट कोकरीब से देखा, सहा और धीरे-धीरे सब पटरी पर आ गया।लेकिन…! इस कहानी में नया क्या है, सिवाय अंत में आने वाले एकजबर्दस्त ट्विस्ट के? कुछ भी तो नहीं। फिर इसी कहानी परबनी मराठी की ‘सैराट’ कैसे इतनी बड़ी हिट हो गई कितमाम भाषाओं में उसके रीमेक बनने लगे। कुछ बात तोजरूर रही होगी उसमें। तो चलिए, उसका हिन्दी रीमेक भीबना देते हैं। कहानी को महाराष्ट्र के गांव से उठा करराजस्थान के उदयपुर शहर में फिट कर देते हैं। हर बात, हरसंवाद में ओ-ओ लगा देते हैं। थारो, म्हारो, आयो, जायो, थे,कथे, कोणी, तन्नै, मन्नै जैसे शब्द डाल देते हैं (अरे यार,उदयपुर जाकर देखो, लोग प्रॉपर हिन्दी भी बोल लेते हैं।और हां, यह ‘पनौती’ शब्द मुंबईया है, राजस्थानी नहीं)। हां,गानों के बोल हिन्दी वाले रखेंगे और संगीत मूल मराठीफिल्म वाला(ज्यादा मेहनत क्यों करें)। ईशान खट्टर औरजाह्नवी कपूर जैसे मनभावन चेहरे, शानदार लोकेशंस, रंग-बिरंगे सैट, उदयपुर की खूबसूरती… ये सब मिल कर इतनाअसर तो छोड़ ही देंगे कि पब्लिक इसे देखने के लिएलपकी चली आए। तो जनाब, इसे कहते हैं पैकेजिंग वाली फिल्में। जब आपदो और दो चार जमा तीन सात गुणा दस बराबर सत्तर करतेहैं तो आप असल में मुनाफे की कैलकुलेशन कर रहे होते हैंन कि उम्दा सिनेमा बनाने की कवायद। दो अलग-अलगहैसियतों याजातियों केलड़के-लड़कीका प्यार औरबीच में उनकेघरवालों का आ जाना हमारी फिल्मों के लिए कोई नया याअनोखा विषय नहीं है। मराठी वाली ‘सैराट’ के इसी विषयपर होने के बावजूद मराठी सिनेमा की सबसे बड़ी हिटफिल्म बनने के पीछे के कारणों पर अलग से और विस्तारसे चर्चा करनी होगी। लेकिन ठीक वही कारण आकर उसकेहिन्दी रीमेक को भी दिलों में जगह दिलवा देंगे, यह सोच हीगलत है। बतौर निर्माता करण जौहर का जोर अगरपैकेजिंग पर रहा तो उसे भी गलत नहीं कहा जा सकता।‘हंपटी शर्मा की दुल्हनिया’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’जैसी कामयाब फिल्में दे चुके शशांक खेतान की इस फिल्मको हिन्दी में लिखने और बनाने में लगी मेहनत दिखती हैलेकिन जिस किस्म की मासूमियत, गहराई, संजीदगी,इमोशंस और परिपक्वता की इसमें दरकार थी, उसे ला पानेमें शशांक चूके हैं-बतौर लेखक और बतौर निर्देशक भी।फिल्म के संवाद काफी साधारण हैं, एक भी ऐसा नहीं जोअसर छोड़ सके। फिल्म की एडिटिंग सुस्त है। किशोर उम्र की प्रेम-कहानियां यानी टीनऐजर लव स्टोरीअगर कायदे से बनी हों तो तो बचकानी लगने के बावजूददेखी और सराही जाती है। इस फिल्म के शुरूआती हिस्सेमें लड़का-लड़की का एक-दूजे की तरफ बढ़ने का हल्का-फुल्का हिस्सा प्यारा लगता है। लेकिन बाद वाले हिस्से मेंमामला ठस्स पड़ जाता है। नतीजे के तौर पर न तो हमेंनायक-नायिका से हमदर्दी होती है, न उनका दर्द महसूसहोता है और न ही हम उनके संघर्ष के सफर के साथी बनपाते हैं। फिल्म बड़ी ही आसानी से अमीर-गरीब या ऊंच-नीच वाले विषय पर ठोस बात कह सकती थी लेकिनलगता है कि बनाने वालों ने पहले से ही किसी विवाद यागंभीर बहस में न पड़ने की ठान रखी थी। ईशान अपने किरदारमें फिट रहे हैं। उनकेकाम में दम दिखता है।हालांकि उन पर बड़ेभाई शाहिद कपूर काकाफी असर नजरआता है। जाह्नवी स्टारमैटीरियल हैं। अपने किरदार के मुताबिक जरूरी अकड़और दमक दिखाने में वह कामयाब रही हैं। संवाद अदायगीमें सुधार लाकर वह और चमकेंगी। इमोशनल दृश्यों में उन्हेंअभी और मैच्योर होने की जरूरत है। यह फिल्म एक खूबसूरत काया भर है-बिना दिल की, बिनाधड़कन की। ‘सैराट’ की छाया से परे जाकर और उससेतुलना किए बिना देखें तो भी यह एक आम, साधारणप्रॉडक्ट ही बन पाई है। इसमें वो बात नहीं है जो आपकेदिलों की धड़कनों को तेज कर सके या उन्हें थाम सके। हां,टाइम पास के लिए यह बुरी नहीं है।

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