ठग्स ऑफ हिंदुस्तान साल की सबसे बड़ी फिल्म ठग नही पाई

ठग्स ऑफ हिंदुस्तान साल की सबसे बड़ी फिल्म् समय :- 164 मिनट अदाकार :- अमिताभ, आमिर, कैथरीना, फातिमा सना, जैकी श्रॉफ, रोनित रॉय, शशांक अरोरा, ल्योड़ ओवेन व अन्य आधारित :- कन्फेशन ऑफ ठग, फिलीप मेडोस टेलर के उपन्यास (1839) पर, (यह चर्चागत विषय-इस पर अगली समीक्षा) निर्देशक व पटकथा:- विजय कृष्ण आचार्य उर्फ विक्टर संगीत:- अजय अतुल गीत:- अमिताभ भट्टाचार्य निर्माता:-YRF-आदित्य चोपड़ा भाषा:- हिंदी, तमिल, तेलगू छायांकन:- मानुष नंदन इफेक्ट:- विशाल आनंद, लुइस ब्रेड्स वेषभूषा:- रविन्द्र पाटिल सेट:- रचना मन्डल स्क्रीन्स:- 5300 भारत, 1500 ओवरसीज़ बजट:- 250 करोड़₹(160+90 करोड़)…

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रिव्यू – ठग्स ऑफ बॉलीवुड है यह

(दीपक दुआ – फिल्म समीक्षक) आखिर एक लंबे इंतज़ार और काफी सारे शोर-शराबे के बाद ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान’ की बंद मुट्ठी खुल ही गई। और अब आप यह जानना चाहेंगे कि यह फिल्म कैसी है? क्या इस फिल्म पर अपनी मेहनत और ईमानदारी (या बेईमानी) से कमाए गए पैसे खर्च किए जाएं या फिर इसे छोड़ दिया जाए? चलिए, शुरू करते हैं। साल 1795 के हिन्दोस्तान की रौनक पुर (चंपक, नंदन, पराग की कहानियों से निकले) नाम वाली कोई रियासत। ऊंचा, भव्य किला जो किसी पहाड़ी पर है लेकिन समुंदर…

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“बत्ती गुल मीटर चालू” आमजन के विषय का पोस्टमार्टम हो गया

निर्देशक:- नारायण सिह अदाकार:- शाहिद, शृद्धा कपूर, दिव्यांशु शर्मा, यामी गौतम, संगीत :- अनु मलिक, रोचक कोहली, सामाजिक विषय पर नारायण पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा बना चुके है, लेकिन ईमानदार विषय के लिये केवल जज़्बा काम नही करता इसके लिए कहानी, पटकथा, संगीत कलाकारों की ईमानदारी भी लाजमी होती है लेकिन इस बार नारायण गच्चा खा गए विषय भारतीयों के बेहद करीब है बिजली बिलों में भारी छूट देकर मध्य प्रदेश सरकार ने अगले चुनाव की भरपाई कर ली है, ओर पिछले सालों में कांग्रेस की डूबने की वजह…

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स्त्री मर्द को दर्द भी होगा और गुदगुदी भी

स्त्री मर्द को दर्द भी होगा और गुदगुदी भी साधारण कहानी का शानदार प्रस्तुतिकरण अदाकार :- राजकुमार, क्षद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बेनर्जी, निर्देशक:- अमर कौशिक संगीत :-  सचिन जिगर समय :- 128 मिनट फ़िल्म के बारे में बात करे उससे पहले यह कहानी कहा से प्रेरित है इस पर चर्चा कर लेते है दक्षिण भारत के एक गाँव मे एक कहानी प्रचलित थी कि एक खूबसूरत वैश्या थी जो कि सच्चा प्यार खोज रही थी ओर वह इसी खोज में मर कर चुड़ैल बन जाती है तो…

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फिल्म समीक्षा: फन्ने खां

फन्ने खां

फन्ने खां साधारण फ़िल्म दोस्तों जब कोई शख्स अपने ख्वाब पूरे नही कर पाता तो वह यही ख्वाब अपने बच्चों के साथ सजाने लगता है दंगल, अपने, बॉक्सर ओर भी कई फिल्में इसकी उदाहरण रही है फन्ने खां एक आम आदमी प्रशांत शर्मा (अनिल कपूर) की कहानी है जो कि एक कामयाब गायक बनना चाहता है लेकिन फेक्ट्री में काम करता है परिवार के खातिर| काम बंद हो जाता है तो टेक्सी चलाने लगता है परिवार के लिए, सपना कहि धूमिल होकर खोने लगता है या परिवारिक जद्दोजहद में गुम…

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धड़क – प्यार भरी धड़कन

निर्देशक :- शशांक खैतान संगीत :- अतुल-अजय कास्ट:- इशांत खट्टर, जहान्वी कपूर, आशुतोष राणा, खरज मुखर्जी, विश्वनाथ चटर्जी अवधि :- 137 मिनट मूल परिकल्पना मराठी फिल्म सैराट का रीमेक है फ़िल्म सैराट मराठी सिनेमा की केवल एक फ़िल्म नही वृतांत थी जिसकी लागत महज 4 करोड़ थी और आमदनी 120 करोड़ ₹ फ़िल्म सैराट का यह पहला रीमेक नही हैं धड़क के पहले भी पंजाबी, कन्नड़, उड़िया भाषा मे रीमेक बन चुके है पंजाबी में पंकज बत्रा चन्ना मोरिया नाम से, कन्नड़ में मानसु मल्लिगे, उड़िया भाषा मे लैला ओ…

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फिल्म समीक्षा: ‘दिल्ली 47 किमी’

'दिल्ली 47 किमी'

www.filmykhabarmantra.com #ReviewRating: 4 star / 5 star फिल्मो को समाज का आइना कहा जाता है. फिल्मकार अपने अपने ढंग से देश और समाज में व्याप्त समस्याओं को दिखाते रहते हैं. इस हफ़्ते रिलीज़ हुई युवा निर्देशक शादाब खान की फिल्म ‘दिल्ली 47 किमी’ समाज की कुछ कडवी सच्चाइयों को बड़ी बेबाकी से दिखाती है. “बीए पास 2′ के फिल्मकार शादाब खान ने अपनी फिल्म ‘दिल्ली 47 किमी’ में समाज के कुछ मुद्दों को बड़ी बेबाकी से दिखाया है. इस फ़िल्म के माध्यम से डायरेक्टर ने तालीम की अहमियत पर ध्यान…

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रिव्यू-‘धड़क’ न तो ‘सैराट’ है न ‘झिंगाट’

ऊंची जात की अमीर लड़की।नीची जात का गरीब लड़का।आकर्षित हुए, पहले दोस्ती,फिर प्यार कर बैठे। घर वालेआड़े आए तो दोनों भाग गए।जिंदगी की कड़वाहट कोकरीब से देखा, सहा और धीरे-धीरे सब पटरी पर आ गया।लेकिन…! इस कहानी में नया क्या है, सिवाय अंत में आने वाले एकजबर्दस्त ट्विस्ट के? कुछ भी तो नहीं। फिर इसी कहानी परबनी मराठी की ‘सैराट’ कैसे इतनी बड़ी हिट हो गई कितमाम भाषाओं में उसके रीमेक बनने लगे। कुछ बात तोजरूर रही होगी उसमें। तो चलिए, उसका हिन्दी रीमेक भीबना देते हैं। कहानी को महाराष्ट्र के गांव से उठा करराजस्थान के उदयपुर शहर में फिट कर देते हैं। हर बात, हरसंवाद में ओ-ओ लगा देते हैं। थारो, म्हारो, आयो, जायो, थे,कथे, कोणी, तन्नै, मन्नै जैसे शब्द डाल देते हैं (अरे यार,उदयपुर जाकर देखो, लोग प्रॉपर हिन्दी भी बोल लेते हैं।और हां, यह ‘पनौती’ शब्द मुंबईया है, राजस्थानी नहीं)। हां,गानों के बोल हिन्दी वाले रखेंगे और संगीत मूल मराठीफिल्म वाला(ज्यादा मेहनत क्यों करें)। ईशान खट्टर औरजाह्नवी कपूर जैसे मनभावन चेहरे, शानदार लोकेशंस, रंग-बिरंगे सैट, उदयपुर की खूबसूरती… ये सब मिल कर इतनाअसर तो छोड़ ही देंगे कि पब्लिक इसे देखने के लिएलपकी चली आए। तो जनाब, इसे कहते हैं पैकेजिंग वाली फिल्में। जब आपदो और दो चार जमा तीन सात गुणा दस बराबर सत्तर करतेहैं तो आप असल में मुनाफे की कैलकुलेशन कर रहे होते हैंन कि उम्दा सिनेमा बनाने की कवायद। दो अलग-अलगहैसियतों याजातियों केलड़के-लड़कीका प्यार औरबीच में उनकेघरवालों का आ जाना हमारी फिल्मों के लिए कोई नया याअनोखा विषय नहीं है। मराठी वाली ‘सैराट’ के इसी विषयपर होने के बावजूद मराठी सिनेमा की सबसे बड़ी हिटफिल्म बनने के पीछे के कारणों पर अलग से और विस्तारसे चर्चा करनी होगी। लेकिन ठीक वही कारण आकर उसकेहिन्दी रीमेक को भी दिलों में जगह दिलवा देंगे, यह सोच हीगलत है। बतौर निर्माता करण जौहर का जोर अगरपैकेजिंग पर रहा तो उसे भी गलत नहीं कहा जा सकता।‘हंपटी शर्मा की दुल्हनिया’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’जैसी कामयाब फिल्में दे चुके शशांक खेतान की इस फिल्मको हिन्दी में लिखने और बनाने में लगी मेहनत दिखती हैलेकिन जिस किस्म की मासूमियत, गहराई, संजीदगी,इमोशंस और परिपक्वता की इसमें दरकार थी, उसे ला पानेमें शशांक चूके हैं-बतौर लेखक और बतौर निर्देशक भी।फिल्म के संवाद काफी साधारण हैं, एक भी ऐसा नहीं जोअसर छोड़ सके। फिल्म की एडिटिंग सुस्त है। किशोर उम्र की प्रेम-कहानियां यानी टीनऐजर लव स्टोरीअगर कायदे से बनी हों तो तो बचकानी लगने के बावजूददेखी और सराही जाती है। इस फिल्म के शुरूआती हिस्सेमें लड़का-लड़की का एक-दूजे की तरफ बढ़ने का हल्का-फुल्का हिस्सा प्यारा लगता है। लेकिन बाद वाले हिस्से मेंमामला ठस्स पड़ जाता है। नतीजे के तौर पर न तो हमेंनायक-नायिका से हमदर्दी होती है, न उनका दर्द महसूसहोता है और न ही हम उनके संघर्ष के सफर के साथी बनपाते हैं। फिल्म बड़ी ही आसानी से अमीर-गरीब या ऊंच-नीच वाले विषय पर ठोस बात कह सकती थी लेकिनलगता है कि बनाने वालों ने पहले से ही किसी विवाद यागंभीर बहस में न पड़ने की ठान रखी थी। ईशान अपने किरदारमें फिट रहे हैं। उनकेकाम में दम दिखता है।हालांकि उन पर बड़ेभाई शाहिद कपूर काकाफी असर नजरआता है। जाह्नवी स्टारमैटीरियल हैं। अपने किरदार के मुताबिक जरूरी अकड़और दमक दिखाने में वह कामयाब रही हैं। संवाद अदायगीमें सुधार लाकर वह और चमकेंगी। इमोशनल दृश्यों में उन्हेंअभी और मैच्योर होने की जरूरत है। यह फिल्म एक खूबसूरत काया भर है-बिना दिल की, बिनाधड़कन की। ‘सैराट’ की छाया से परे जाकर और उससेतुलना किए बिना देखें तो भी यह एक आम, साधारणप्रॉडक्ट ही बन पाई है। इसमें वो बात नहीं है जो आपकेदिलों की धड़कनों को तेज कर सके या उन्हें थाम सके। हां,टाइम पास के लिए यह बुरी नहीं है।

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बॉयोपिक या सत्य घटना पर फिल्मो का बढ़ता चलन

फ़िल्म समीक्षक : इदरीस खत्री : दोस्तो भारतीय फिल्मों को नया विषय मिल गया है ऐसी फिल्में न केवल आम लोगो तक उन लोगो की ज़िन्दगी की जद्दोजहद दिखा कर, उनके लगन और मेहनत से जनता को न केवल प्रेरित करती है बल्कि प्रेरणा दायक भी होती है बॉयोपिक यानी जीवन वृतान्त आधारित फिल्म या किसी पूर्व घटित घटना को फ़िल्म रूप दे दिया जाए वेसे भारत मे यह चलन लगातार चल रहा है परंतु अभी अभी इसका क्रेज बड गया है, हालिया कामयाब फ़िल्म संजू संजय दत्त की ज़िंदगी…

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संजय दत्त की ज़िंदगी किसी फिल्मी कथा से कम नही रही है

संजू इदरिस खत्री द्वारा,,,, दोस्तो संजय दत्त की ज़िंदगी किसी फिल्मी कथा से कम नही रही है राजकुमार ने बायोपिक बना कर निश्चित ही कोई सट्टा नही खेला संजय की ज़िंदगी नामा हर भारतीय जानना चाहता है नाम, शोहरत, पैसा अगर आता है तो नशा, सेक्स, पीछे से दबे पांव आना लाजमी है| जैसे गाड़ी खरीदी तो पेट्रोल लाजमी होगा वेसे ही नाम, शोहरत, पैसा जब पैरों तले आता है तो नशा,लडकिया आना लाजमी होगा| नही तो वह शख्स सन्त ही होगा जो बच निकले इस से ख़ैर संजू पर…

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