फिल्मो में बढ़ता VFX का चलन, भाग –2

दोस्तो VFX का हिंदी प्रचलित कोई लब्ज़ नही मिलने और यही लब्ज़ प्रचलित होने के कारण अंग्रेजी भाषा से ले लिया दोस्तो VFX का प्रभाव और इस्तेमाल फिल्मो की आनिवार्यता बनते जा रहा है आज पिछली चर्चा को आगे बढ़ाता हूँ, हॉलीवुड तो बेइंतेहा आगे सफर कर रहा है VFX के मामले में, हम यानी भारतीय सिनेमा हॉलीवुड सिनेमा से न केवल प्रभावित है वरन उसकी अनुकरण यानी कॉपी को शान समझता है, क्योकि हॉलीवुड की फिल्मों में जो माइल स्टोन स्थापित किया है वह अतुलनीय के साथ प्रसंशात्मक भी…

पूरा पढ़िए...

रिव्यू-‘2.0’-शानदार दृश्यों में लिपटी खोखली फिल्म

आठ बरस पहलेआई ‘रोबोट’ मेंडॉ. वसीकरन केबनाए रोबोटचिट्टी को समाजके लिएखतरनाक मान कर सरकार ने लैब में बंद कर दिया था। लेकिन अब उसकीज़रूरत आन पड़ी है। खतरा है ही इतना बड़ा कि सिर्फ चिट्टी ही उससे निबटसकता है। और यह खतरा है मोबाइल फोन से। सारे शहर के मोबाइल फोनअचानक उड़ कर गायब हो चुके हैं। कौन कर रहा है ऐसा और क्यों? वसीकरनऔर चिट्टी कैसे निबटेंगे उससे? ‘रोबोट’ आई थी तो उसे देखकर गर्व महसूस हुआ था किसाईंस-फिक्शन पर सिर्फहॉलीवुड का ही एकाधिकारनहीं है। वैज्ञानिक परिभाषाओंऔर मानवीय संवेदनाओं कोमिला कर हमारे लोग भीकायदे की कहानी कह सकते हैं। इस फिल्म ने यह भी दिखाया था कि स्पेशलइफैक्ट्स के मामले में भी हम किसी से कम नहीं हैं। उम्दा कहानी, कसी हुईस्क्रिप्ट, मंजे हुए निर्देशन, शानदार तकनीक, गीत-संगीत, एक्शन, रोमांस,दुश्मनी, छल-कपट, अहं, हास्य, रजनीकांत-ऐश्वर्या राय, डैनी के सधे हुएअभिनय जैसे तमाम तत्व परोसते हुए इस फिल्म ने दक्षिण से आने वाली डबफिल्मों की आंधी को तेज किया था। इसीलिए जब से ‘रोबोट’ के सीक्वेल ‘2.0’के आने की आहट हुई तो इस फिल्म पर उम्मीद भरी निगाहें जमने लगी थीं।लेकिन बड़े ही अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि यह फिल्म उम्मीदें तोड़तीहै और सिर्फ स्पेशल इफैक्ट्स को छोड़ कर हर मोर्चे पर बेहद औसत दर्जे कीलगती है। एक पक्षी-विज्ञानी का माननाहै कि मोबाइल फोन औरमोबाइल टॉवर से निकलनेवाले रेडिएशन से पक्षी मर रहेहैं। वह पक्षी-विज्ञानी कैसेबना, इसके पीछे की जोबचकानी वजह फिल्म मेंबताई गई है उसे देख-जानकर आप चाहें तो हंस सकते हैं, चाहें तो लिखने वाले की अक्ल पर तरस भी खासकते हैं। खैर, सब तरफ से यह बंदा इतना निराश हो जाता है कि इसे मोबाइलफोन और उसे इस्तेमाल करने वालों से नफरत हो जाती है क्यों भई, इस्तेमालकरने वालों की क्या गलती…? लगता है डायरेक्टर शंकर यह भूल गए कि उन्हींकी फिल्म ‘अपरिचित’ का हीरो ट्रेन में घटिया खाना मिलने पर खाना खानेवाले, बेचने वाले या बनाने वाले को नहीं मारता बल्कि उस ठेकेदार को मारता हैजो पूरे पैसे लेकर भी घटिया खाना बनवाता है। यही व्यावहारिक भी है,तर्कसंगत भी। ओह, हो, हो… तर्क की बात तो आप इस फिल्म को देखते समयकीजिए ही मत। और आप हैं कौन? जिन्होंने ‘रेस 3’ और ‘ठग्स ऑफहिन्दोस्तान’ हिट करवा खुद ही इन निर्देशकों को बता दिया कि आप चमकतेरैपर में लिपटी घटिया चीज़ भी खुश होकर गटक लेते हैं। तो लीजिए, उन्होंनेआपको बेहद शानदार स्पेशल इफैक्ट्स में लपेट कर यह फिल्म दे दी है, गटकलीजिए। हॉलीवुड की फिल्मों में हमअक्सर देखते हैं कि एक भीड़भरे इलाके में कोई सुपरविलेन और सुपर हीरो आपसमें भिड़े हुए हैं, लेकिन लोगउनकी तरफ ध्यान दिए बगैरआ-जा रहे हैं, हालांकि इसभिड़ंत में ढेरों लोग मर रहे हैं,इमारतें टूट रही हैं, गाड़ियांउड़ रही हैं लेकिन लोग अपने में बिज़ी हैं और ये दोनों हैं कि बस, भिड़े हुए हैं।यह देख कर कई बार लगता है कि क्या सचमुच ऐसा हो सकता है? यहां तोसड़क पर दो सांड भिड़ जाएं तो पब्लिक ऑफिस-दुकान जाना छोड़ कर मजमालगा ले। लेकिन इस फिल्म में ऐसा ही है। भई, एक तो आपको हॉलीवुड स्टाइलका एंटरटेनमैंट दे रहे हैं और आप हैं कि तर्क की पूंछ पकड़ कर झूल रहे हैं। हदहै…! चिट्टी ने आकर किया क्या,सिवाय साबू-नुमा हरकतेंकरने के, जो चाचा चौधरी कोबचाने के लिए सिर्फ ताकतका इस्तेमाल करता है,दिमाग का नहीं। उससे बेहतरतो वो लेडी-रोबोट निकली।शक्ल से सपाट एमी जैक्सनसुंदर तो लग ही रही थीं। औरपिछली वाली फिल्म के डैनीके इस फिल्म वाले बेटे, तुमको यह तीन सीन का ही रोलमिलना था? कायदे का रोल तो इस  बार किसी भी साइड-एक्टर को नहीं मिला।अक्षय कुमार पूरे समय गैटअप में ही रहे सो ध्यान उनके मेकअप पर ज़्यादाजाता है, एक्टिंग पर कम। रजनीकांत के फैन चाहें तो उन्हें देख कर गिर-पड़-लेट सकते हैं लेकिन इस बार तो वो भी कम ही जंच रहे थे। और हां, वसीकरनकी पत्नी सना के लिए इन लोगों को कायदे का रोल तो छोड़िए, ऐश्वर्या राय कीआवाज़ तक न मिल सकी, हाय…! गीत-संगीत पैदल है। हालांकि फिल्म एक अच्छा मैसेज देने की कोशिश करती है कि आज हर इंसान मोबाइल फोन का गुलाम हो चुका है। लेकिन फिल्म के भीतर लड़ाई इस गुलामीसे लड़ने की बजाय रेडिएशन से लड़ी जाती है। रेडिएशन इंसानों को भी नुकसानपहुंचाता है, इस आशय के संवादों को सेंसर ने काट दिया। तो साबित क्याहुआ…? पक्षियों के प्रति भी यह फिल्म कोई खास संवेदनाएं नहीं जगा पाती।दरअसल यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी है कि इसकी कहानी आपकोछुए बगैर निकल जाती है और आप सिर्फ भव्य दृश्यों की चकाचौंध में खोएरहते हैं। फिल्म में कई सारे ब्रांड्स के विज्ञापन घुसेड़ने में जो दिमाग लगायागया, उसे कहानी को मजबूत बनाने में लगाया जाता तो इसका कद कुछ औरही होता। यह फिल्म सिर्फ और सिर्फ अपने स्पेशल इफैक्ट्स के लिए ही देखी जा सकतीहै। आंखों पर थ्री-डी चश्मा लगाने के बाद अपने दिमाग को स्लीप-मोड में डालदीजिएगा। ज़रा-सा भी तर्क आपके मनोरंजन में खलल डाल सकता है। अपनी रेटिंग-ढाई स्टार दीपक दुआ फिल्म समीक्षक 

पूरा पढ़िए...

नाम बड़े दर्शन खोटे

हाल ही फ़िल्म प्रदर्शित हुई ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान, जिसके प्रदर्शन पूर्व बड़ी बड़ी घोषणाए, लोक लुभावन वादे ओर फ़िल्म को लेकर सपने दिखाए गए थे हत्ता की प्रचार में फ़िल्म को भारत की सार्वकालिक महंगी फ़िल्म बताया गया बजट 250+60यानी 300 करोड़ी फ़िल्म बताया गया लेकिन फ़िल्म को न तो समीक्षकों के गले उतरी ओर न ही दर्शको के गले उतर पाई कहने का मतलब यह कि बड़ी स्टार कास्ट कोई सफलता की ग्यारंटी नही होते है, फ़िल्म बजट 300 करोड़ आमदनी 160 करोड़ मात्र तो फ़िल्म फ्लॉप की श्रेणी…

पूरा पढ़िए...

भईया जी सुपरहिट

भईया जी सुपरहिट काश नाम की तरह काम चल जाता लेकिन फ़िल्म में ऐसा कुछ भी न हो पाया यह फ़िल्म लगभग 7 साल पहले शुरू हुई थी, सन 2012 में इसका पहला पोस्टर लांच किया गया था उसके बाद से तमसम पचड़ों(लम्बी दास्तान) के चलते फ़िल्म न बन पाई न प्रदर्शित हो पाई, अब जाकर फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो हुवा भी यही जो स्टॉक क्लियरन्स सेल में होता है, दर्शको ने सिरे से नकार दिया, अब जब कि बॉलीवुड दर्शको को हिंदी, दक्षिड, हॉलीवुड के साथ विश्व सिनेमा आसानी…

पूरा पढ़िए...

ठग्स ऑफ हिंदुस्तान साल की सबसे बड़ी फिल्म ठग नही पाई

ठग्स ऑफ हिंदुस्तान साल की सबसे बड़ी फिल्म् समय :- 164 मिनट अदाकार :- अमिताभ, आमिर, कैथरीना, फातिमा सना, जैकी श्रॉफ, रोनित रॉय, शशांक अरोरा, ल्योड़ ओवेन व अन्य आधारित :- कन्फेशन ऑफ ठग, फिलीप मेडोस टेलर के उपन्यास (1839) पर, (यह चर्चागत विषय-इस पर अगली समीक्षा) निर्देशक व पटकथा:- विजय कृष्ण आचार्य उर्फ विक्टर संगीत:- अजय अतुल गीत:- अमिताभ भट्टाचार्य निर्माता:-YRF-आदित्य चोपड़ा भाषा:- हिंदी, तमिल, तेलगू छायांकन:- मानुष नंदन इफेक्ट:- विशाल आनंद, लुइस ब्रेड्स वेषभूषा:- रविन्द्र पाटिल सेट:- रचना मन्डल स्क्रीन्स:- 5300 भारत, 1500 ओवरसीज़ बजट:- 250 करोड़₹(160+90 करोड़)…

पूरा पढ़िए...

रिव्यू – ठग्स ऑफ बॉलीवुड है यह

(दीपक दुआ – फिल्म समीक्षक) आखिर एक लंबे इंतज़ार और काफी सारे शोर-शराबे के बाद ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान’ की बंद मुट्ठी खुल ही गई। और अब आप यह जानना चाहेंगे कि यह फिल्म कैसी है? क्या इस फिल्म पर अपनी मेहनत और ईमानदारी (या बेईमानी) से कमाए गए पैसे खर्च किए जाएं या फिर इसे छोड़ दिया जाए? चलिए, शुरू करते हैं। साल 1795 के हिन्दोस्तान की रौनक पुर (चंपक, नंदन, पराग की कहानियों से निकले) नाम वाली कोई रियासत। ऊंचा, भव्य किला जो किसी पहाड़ी पर है लेकिन समुंदर…

पूरा पढ़िए...

“बत्ती गुल मीटर चालू” आमजन के विषय का पोस्टमार्टम हो गया

निर्देशक:- नारायण सिह अदाकार:- शाहिद, शृद्धा कपूर, दिव्यांशु शर्मा, यामी गौतम, संगीत :- अनु मलिक, रोचक कोहली, सामाजिक विषय पर नारायण पहले टॉयलेट एक प्रेम कथा बना चुके है, लेकिन ईमानदार विषय के लिये केवल जज़्बा काम नही करता इसके लिए कहानी, पटकथा, संगीत कलाकारों की ईमानदारी भी लाजमी होती है लेकिन इस बार नारायण गच्चा खा गए विषय भारतीयों के बेहद करीब है बिजली बिलों में भारी छूट देकर मध्य प्रदेश सरकार ने अगले चुनाव की भरपाई कर ली है, ओर पिछले सालों में कांग्रेस की डूबने की वजह…

पूरा पढ़िए...

स्त्री मर्द को दर्द भी होगा और गुदगुदी भी

स्त्री मर्द को दर्द भी होगा और गुदगुदी भी साधारण कहानी का शानदार प्रस्तुतिकरण अदाकार :- राजकुमार, क्षद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बेनर्जी, निर्देशक:- अमर कौशिक संगीत :-  सचिन जिगर समय :- 128 मिनट फ़िल्म के बारे में बात करे उससे पहले यह कहानी कहा से प्रेरित है इस पर चर्चा कर लेते है दक्षिण भारत के एक गाँव मे एक कहानी प्रचलित थी कि एक खूबसूरत वैश्या थी जो कि सच्चा प्यार खोज रही थी ओर वह इसी खोज में मर कर चुड़ैल बन जाती है तो…

पूरा पढ़िए...

फिल्म समीक्षा: फन्ने खां

फन्ने खां

फन्ने खां साधारण फ़िल्म दोस्तों जब कोई शख्स अपने ख्वाब पूरे नही कर पाता तो वह यही ख्वाब अपने बच्चों के साथ सजाने लगता है दंगल, अपने, बॉक्सर ओर भी कई फिल्में इसकी उदाहरण रही है फन्ने खां एक आम आदमी प्रशांत शर्मा (अनिल कपूर) की कहानी है जो कि एक कामयाब गायक बनना चाहता है लेकिन फेक्ट्री में काम करता है परिवार के खातिर| काम बंद हो जाता है तो टेक्सी चलाने लगता है परिवार के लिए, सपना कहि धूमिल होकर खोने लगता है या परिवारिक जद्दोजहद में गुम…

पूरा पढ़िए...

धड़क – प्यार भरी धड़कन

निर्देशक :- शशांक खैतान संगीत :- अतुल-अजय कास्ट:- इशांत खट्टर, जहान्वी कपूर, आशुतोष राणा, खरज मुखर्जी, विश्वनाथ चटर्जी अवधि :- 137 मिनट मूल परिकल्पना मराठी फिल्म सैराट का रीमेक है फ़िल्म सैराट मराठी सिनेमा की केवल एक फ़िल्म नही वृतांत थी जिसकी लागत महज 4 करोड़ थी और आमदनी 120 करोड़ ₹ फ़िल्म सैराट का यह पहला रीमेक नही हैं धड़क के पहले भी पंजाबी, कन्नड़, उड़िया भाषा मे रीमेक बन चुके है पंजाबी में पंकज बत्रा चन्ना मोरिया नाम से, कन्नड़ में मानसु मल्लिगे, उड़िया भाषा मे लैला ओ…

पूरा पढ़िए...